नई दिल्ली ब्यूरो
नई दिल्ली(परिपाटी न्यूज़)।दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट के विशेष (सीबीआई) न्यायाधीश जितेंद्र सिंह ने दिल्ली आबकारी नीति मामले में सीबीआई की जांच पर कड़ी टिप्पणी करते हुए जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की सिफारिश की है। अदालत ने कहा कि जांच केवल त्रुटिपूर्ण नहीं थी, बल्कि यह संस्थागत कदाचार की श्रेणी में आती है।

शुक्रवार को अदालत ने इस मामले में नामजद आम आदमी पार्टी (आप) के नेता अरविंद केजरीवाल सहित 22 आरोपियों को आरोपमुक्त कर दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि लोक सेवकों के खिलाफ अभियोजन चलाने के लिए पर्याप्त और ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं थे।
अपने आदेश में अदालत ने कहा कि न्यायालय का दायित्व केवल त्रुटिपूर्ण या दूषित जांच सामग्री को खारिज करना नहीं है, बल्कि संबंधित जांच अधिकारी के विरुद्ध उचित विभागीय कार्यवाही की संस्तुति करना भी है, ताकि जवाबदेही सुनिश्चित हो सके और जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता बनी रहे।
कोर्ट ने जांच को “पूर्व नियोजित और योजनाबद्ध प्रक्रिया” बताते हुए कहा कि भूमिकाएं पहले से तय कथानक के अनुरूप बाद में निर्धारित की गई प्रतीत होती हैं। न्यायालय के अनुसार, कुछ लोक सेवकों पर केवल एक सरकारी गवाह से जुड़ी अप्रमाणिक और कानूनी रूप से अस्वीकार्य सुनी-सुनाई बातों के आधार पर मुकदमा चलाया गया।
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि संबंधित अधिकारी कोरोना महामारी के दौरान असाधारण दबाव और व्यक्तिगत जोखिम के बीच अपनी नियमित प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभा रहे थे। इसके बावजूद उनके खिलाफ पर्याप्त आधार के बिना कार्रवाई की गई।
न्यायालय ने “पूर्वानुमानित हेरफेर” पर भी आपत्ति जताई और कहा कि कुछ व्यक्तियों को एक ओर संदिग्धों की सूची में रखा गया, वहीं दूसरी ओर उन्हें अभियोजन पक्ष के गवाह के रूप में पेश किया गया। इसे अदालत ने सोची-समझी रणनीति बताया, जिससे जांच की कमियों को भविष्य में ढका जा सके।
अदालत ने चेतावनी दी कि यदि इस प्रकार के आचरण को बिना परिणाम के छोड़ दिया गया, तो यह जनता के विश्वास को कमजोर करेगा और कानून के शासन की मूल भावना के विपरीत होगा।