30 दिन चुप्पी, 45 दिन बाद खारिज — अब शुल्क वापसी पर भी सवाल
हरिओम सिंह
लखीमपुर खीरी ग्राम पंचायत बगरेठी, विकासखंड मोहम्मदी में सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत दायर आवेदन को पहले 30 दिन तक लंबित रखा गया और बाद में 45 दिन बीतने के बाद तकनीकी आधार पर निरस्त कर दिया गया। लेकिन अब इस पूरे प्रकरण में एक नया और गंभीर प्रश्न जुड़ गया है — क्या आवेदन शुल्क के ₹10 भी वापस नहीं किए गए? आवेदक द्वारा विधिसम्मत रूप से ₹10 का नोट आवेदन के साथ संलग्न किया गया था। यदि आवेदन को अस्वीकार्य मानते हुए निरस्त किया गया, तो क्या शुल्क वापसी का उल्लेख आदेश में होना चाहिए था? सूत्रों के अनुसार न तो राशि वापस की गई और न ही आदेश में इसका कोई स्पष्ट जिक्र किया गया।
कानूनी नजरिए से उठते सवाल यदि आवेदन अमान्य था, तो शुल्क स्वीकार क्यों किया गया? यदि शुल्क स्वीकार किया गया, तो आवेदन वैध प्रक्रिया में माना जाएगा — फिर निरस्तीकरण किस आधार पर? क्या आवेदन निरस्त करने के साथ शुल्क वापसी की कार्यवाही आवश्यक नहीं थी? इस मामले में उत्तर देने वाले अधिकारी मनोज कुमार यादव, ग्राम पंचायत अधिकारी हैं। प्रथम अपील में भी राहत न मिलने के बाद अब मामला उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग, लखनऊ में विचाराधीन है, जहां धारा 20(1) के तहत दंडात्मक कार्यवाही, अधिकतम ₹25,000 जुर्माना और क्षतिपूर्ति की मांग की गई है। बड़ा सवाल भले ही राशि ₹10 हो, लेकिन सिद्धांत बड़ा है — क्या पारदर्शिता के नाम पर सूचना रोकी गई और शुल्क भी रख लिया गया? जनता अब जानना चाहती है — क्या यह मात्र प्रक्रिया की भूल है या जवाबदेही से बचने की कोशिश? अब निगाहें सूचना आयोग की सख्त कार्रवाई पर टिकी हैं।