परंपरागत फसलों से किसान को 10 गुना ज्यादा मुनाफा।
मुकुट यादव
संभल( परिपाटी न्यूज़) के किसान अब गेहूं-धान की पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर स्ट्रॉबेरी जैसी नकदी फसल की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं। लाल सोना’ कही जाने वाली स्ट्रॉबेरी की खेती ने जिले में नई आर्थिक क्रांति की शुरुआत कर दी है। इस वर्ष स्ट्रॉबेरी विकास योजना के तहत 35 किसानों ने इसकी खेती शुरू की है, जबकि निजी प्रयासों के चलते जिले में कुल रकबा करीब 100 हेक्टेयर तक पहुंच गया है। जिला उद्यान अधिकारी सौरभ बंसल के अनुसार,प्रति हेक्टेयर 12 से 13 लाख रुपये तक की लागत आती है। इसमें महाबलेश्वर (पुणे) और हिमाचल से मंगाए गए उच्च गुणवत्ता के पौधे, मलचिंग,ड्रिप सिंचाई और श्रम लागत शामिल है। हालांकि बाजार में बेहतर दाम मिलने से किसानों को 7 से 8 लाख रुपये तक की शुद्ध आमदनी हो रही है। दिल्ली की आजादपुर मंडी नजदीक होने से विपणन में भी सहूलियत मिल रही है।सरकार की ओर से किसानों को बड़ा संबल दिया जा रहा है।

लघु एवं सीमांत किसानों को 90 प्रतिशत तथा सामान्य श्रेणी के किसानों को 80 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जा रही है। इससे महंगी खेती भी किसानों के लिए आसान हो गई है।प्रगतिशील किसान कुलदीप बताते हैं कि एक एकड़ में पहली बार लागत 6.5 से 7 लाख रुपये आती है,जबकि दूसरे वर्ष यह घट जाती है। 2 किलो की एक ट्रे 700 से 1200 रुपये तक बिक रही है। उनका कहना है कि जहां पारंपरिक खेती से 70 हजार से 1 लाख रुपये तक आमदनी होती थी, वहीं स्ट्रॉबेरी से 5 से 6 लाख रुपये तक शुद्ध लाभ मिल रहा है।जनवरी से शुरू होने वाली तुड़ाई मार्च तक चलती है।संभल की स्ट्रॉबेरी की मांग दिल्ली,जयपुर,लखनऊ,देहरादून और मेरठ समेत कई बड़े शहरों में है। विशेषज्ञों द्वारा प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं, जिससे किसान आधुनिक तकनीकों से उत्पादन बढ़ा सकें।स्ट्रॉबेरी की मिठास अब संभल के किसानों की आर्थिक खुशहाली की पहचान बनती जा रही है