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लेखिका – संजू देवी

समय का सदुपयोग करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है। एक मजदूर से लेकर नेता तक, अनपढ़ से लेकर शिक्षित व्यक्ति तक—हर किसी के जीवन में समय का महत्व समान रूप से होता है। जिसने समय की कद्र की, वही जीवन में सफल हुआ है। समय ही वह आधार है, जिस पर सफलता की इमारत खड़ी होती है।


किन्तु यदि किसी के जीवन में समय का सबसे अधिक महत्व है, तो वह है विद्यार्थी। विद्यार्थी का जीवन पूरी तरह समय-सारणी पर आधारित होता है। सुबह समय पर उठना, विद्यालय के लिए तैयार होना, प्रार्थना सभा में उपस्थित होना, कक्षाओं में ध्यानपूर्वक अध्ययन करना, समय पर गृहकार्य पूरा करना और उचित समय पर विश्राम करना—ये सभी उसकी दिनचर्या के आवश्यक अंग हैं। विशेषकर परीक्षा के समय तो प्रत्येक क्षण अत्यंत मूल्यवान हो जाता है। परीक्षा कक्ष में निर्धारित समय समाप्त होते ही अध्यापक उत्तर पुस्तिका ले लेते हैं, चाहे उत्तर पूरा हुआ हो या नहीं। कभी-कभी कुछ ही मिनटों की कमी विद्यार्थी के कुछ महत्वपूर्ण अंकों को छीन लेती है। यही कुछ अंक उसके परिणाम और भविष्य की दिशा तय कर सकते हैं। विद्यार्थी के जीवन में समय एक बहती नदी के समान है—जो एक बार निकल गया, वह लौटकर नहीं आता। समय का दुरुपयोग असफलता, निराशा और पछतावे का कारण बनता है। इसके विपरीत, समय का सही उपयोग आत्मविश्वास, सफलता और सम्मान दिलाता है।
परंतु प्रश्न यह उठता है कि यदि कोई विद्यार्थी परीक्षा के समय पर विद्यालय नहीं पहुंच पाता और गेट बंद हो जाता है, तो इसका उत्तरदायी कौन है? माता-पिता, सड़क पर लगा लंबा जाम, या स्वयं विद्यार्थी की लापरवाही?
अक्सर माता-पिता अपनी जिम्मेदारी पूरी निष्ठा से निभाते हैं। वे बच्चों के भोजन, अध्ययन, सुरक्षा और समय पर घर लौटने तक का पूरा ध्यान रखते हैं। फिर भी कभी-कभी सड़क पर यातायात जाम, परिवहन की समस्या या अन्य अप्रत्याशित कारण विद्यार्थियों के लिए बाधा बन जाते हैं। कोई भी विद्यार्थी जानबूझकर परीक्षा में देर से नहीं पहुंचना चाहता। हाल ही में बिहार का एक दुखद मामला सामने आया, जिसमें एक छात्रा को मात्र दो मिनट की देरी के कारण परीक्षा केंद्र में प्रवेश नहीं दिया गया। वह विनती करती रही, परंतु नियमों की कठोरता के कारण उसकी बात नहीं सुनी गई। इस घटना ने पूरे समाज को सोचने पर विवश कर दिया। नियम आवश्यक हैं, परंतु उनमें मानवीय संवेदनशीलता भी होनी चाहिए। जब परीक्षा जैसे महत्वपूर्ण अवसर हों, तब विद्यार्थियों को वैसी प्राथमिकता मिलनी चाहिए जैसी आपातकाल में एंबुलेंस को दी जाती है। चाहे वह भारत के किसी भी राज्य का मामला हो, विद्यार्थी का समय और उसका जीवन दोनों अमूल्य हैं। समाज और प्रशासन की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि वे ऐसे अवसरों पर सहानुभूति और सहयोग का परिचय दें। साथ ही विद्यार्थियों को भी चाहिए कि वे समय का महत्व समझें, अनुशासन अपनाएं और संभावित बाधाओं को ध्यान में रखते हुए समय से पहले परीक्षा केंद्र पहुंचें। अंततः यही कहा जा सकता है कि समय सभी के लिए अमूल्य है, परंतु विद्यार्थी के लिए यह उसके भविष्य की कुंजी है। समय का सम्मान ही सफलता का प्रथम सूत्र है।

By विक्की जोशी

विक्की जोशी मंडल आई.टी. प्रभारी मुरादाबाद

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