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ठा नरेंद्र सिंह तोमर कोथरकला

बून्दी नरेश राव राजा रतन सिंह जी के तीन पुत्र थे कुंवर गोपीनाथ,माधो सिंह और हरी सिंह।
हरि सिंह जी को खरेड़ का पीपल्दा की जागीर मिली थी।माधो सिंह जी कोटा के स्वामी बने व गोपीनाथ कुंवरपन में ही वीरगति को प्राप्त हो गए थे।
हरि सिंह बाल्यकाल से ही परम् वीर व अतिउग्र स्वभाव के थे। हरी सिंह जी व माधो सिंह जी राव रतन सिंह जी के साथ हर युद्ध मे भाग लिया करते थे।हरि सिंह जी व माधो सिंह जी ने शाही सेना के साथ मिलकर गागरणी व मउ के खिचीयो को परास्त कर उस क्षेत्र को भी हाड़ौती साम्राज्य का हिस्सा बना लिया था।विस्तारवादी नीति के तहत राव रतन के पुत्रों ने बून्दी का काफी विस्तार किया।जब शाहजहाँ (खुर्रम) ने उसके पिता बादशाह जहांगीर के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंक दिया था,इससे तंग आकर जहाँगीर ने खुर्रम को मरवाने के आदेश दे दिए। राव रतन सिंह जी को ही यह कार्य मिला इसमे उनके पुत्र भी साथ थे। राव रतन सिंह जी ने खुर्रम को बुरी तरह परास्त कर बंधी बना लिया व उसे जहाँगीर के कहे अनुसार उसको ना सौपते हुए न मारते हुए अपने पुत्र वीरवर हरि सिंह जी के पास रख दिया व उसे हर सुविधा देने को कहा। हरि सिंह जी अतिउग्र स्वभाव के व्यक्ति थे।उनको इससे अच्छा अवसर कहाँ मिलने वाला था।राव रतन के जाने के बाद वे खुर्रम को बड़ी हीन भावना से देखते थे व उसे अनेको यातनाएं देने लगे।उसे तुरकड़ा कहकर सम्भोधित किया करते थे।हरि सिंह जी शाहजहाँ से अपने पैर दबवाया करते थे।हुक्का भरवाया करते थे।ऐसी स्थिति में शायद ही कोई बादशाह रहा होगा परन्तु हरि सिंह जी ने ये भी कर दिखाया।शाहजहाँ की स्थिति ऐसी थी कि ना तो वह हरि सिंह जी जैसे वीर का सामना कर सकता था ना वहाँ से भाग सकता था। कुछ समय पश्चात जब राव रतन शाहजहाँ की खैरियत जानने आये तो शाहजहाँ ने उसकी आपबीती राव रतन सिंह जी को सुनाई।तब बून्दी नरेश ने शाहजहाँ को हरी सिंह जी के पास से माधो सिंह जी के पास रखवा दिया।माधो सिंह जी ने उसकी बहुत खिदमत की जिसका परिणाम ये रहा कि जब जहाँगीर के कोई वारिस नही बचा व शाहजहाँ को राव रतन के सौपने के बाद राजा बनाना पड़ा तब शाहजहाँ ने माधो सिंह को बून्दी से अलग कोटा रियासत के स्वामित्व प्रदान किया।

यदि हरि सिंह जी चाहते तो माधो सिंह की तरह ही शाहजहाँ की सेवा करके बड़ी जागीरे व रियासत प्राप्त कर सकते थे परन्तु वे अपने स्वाभिमान के साथ समझौता नही कर सकते थे।उनको यह कदापि स्वीकार नही था कि वे किसी मुगल की चाकरी करे।महाराज हरि सिंह जी ने अपने निजी स्वार्थ बिल्कुल दरकिनार कर दिया।

By PARIPATI NEWS

PARIPATI NEWS MEDIA GROUP

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