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क्राइम संवाददाता-जोगेंद्र तोमर/परिपाटी न्यूज मीडिया

पीलीभीत/बीसलपुर परिपाटी न्यूज। सरकार के लाख प्रयासों के बावजूद भी कुम्हारी कला पर संकट के बादल मंडराते हुए स्पष्ट नजर आ रहे हैं। दीपावली पर्व पर घर -घर में दीपों की रोशनी कर उनके घर उजियाले करने वलों के भविष्य में तो अंधकार छाया हुआ है। जीतोड़ मेहनत के बावजूद उन्हें अपने परिवार का लालन पालन करने के लिए

अपनी हस्त कला के अतिरिक्त मजदूरी का कार्य भी कर परिवार का पालन पोषण करना पड़ रहा है। यह उनके भाग्य की बिडम्बना ही है।दीपावली पर्व नजदीक आते ही घर घर में अपनी कला की कुशलता के बल पर दीपों को बनाकर लागों के घरों तक पहुंचाने के बाद उनके घर रोशन करने वाले कुम्हारों का आज कल पूरा समय उनके चाक पर ही दिये बनाते हुए बीत जाता है। किन्तु फिर भी उनकी इस मेहनत व कलाकारी की कीमत समाज के लोग नहीं आंक पाते हैं और 100 दिये जिन्हें बनाने में लगभग जितना समय उनका नष्ट होता है उसकी कीमत भी उन्हें अपनी मेहनत के बावजूद नहीं मिल पाती है। यह उनके भग्य की बिडम्बना है। सरकार की कुम्हारी कला क्षेत्र में चलाई गई योजनाओं के तहत सभी कुम्भकारों को इलेक्ट्रिक चाक दिये जाने का बादा किया गया था। किन्तु अभी भी चाक को डंडे से गति देने के लिए यह शिल्पकार मजबूर हैं। नगर के मोहल्ला दुर्गाप्रसाद में कुम्हारी कला का पुस्तैनी काम करने वाले तेजराम का कहना है कि उसके पिता रतनलाल तथा 100 साल पूर्व उसके बाबा गेंदनलाल ने भी अपने बुजुर्गों से यह कला पाई थी। जिस कला के हुनर से आज भी वह अपने परिवार का लालन पालन कर रहा है। तेजराम का कहना है कि 100 कुल्हड़ बनाने पर उसे 400 रुपये 100 दिये पर 50 रुपये, 100 कुल्हड़ चाय के वनाने में 70 रुपये तथा बड़ी प्याली बनाने में एक रुपया प्याली उसे मिलती है। किन्तु दुर्भाग्यबश इतना काम करने के लिए उसका पूरा परिवार जिसमें पत्नी गुड्डी देवी, बड़ी बेटी लक्ष्मी, छोटी प्रीती, बेटा ज्ञान प्रकाश उनकी मदद में लगे रहते हैं। तेजराम का कहना है कि एक तो महंगाई की मार से उनकी कुम्हारी कला टूटती नजर आ रही है साथ ही जब वह कुल्हड़ प्याली व दीपक बनाने के लिए सड़क किनारे से थेड़ी सी मिट्टी निकालकर लाते होते हैं तो उन्हें रास्ते में पुलिसकर्मी पकड़ लेते हैं और जेब गर्म करने के बाद ही उन्हें छोड़ते हैं। इन बिषम परिस्थितियों में भी वह अपने पुस्तैनी कार्य में लगा हुआ है। वर्षा ऋतु आने पर दो माह तक यह कार्य बंद करना पड़ता है और परिवार का लालन पालन करने के लिए उसे व उसके बेटे को मजदूरी करने घर से निकलना पड़ता है। दीपावली का पर्व होने के बावजूद भी उसके घर पर लिपाई पुताई नहीं हो सकी है। क्योंकि उसकी जेब हल्की है और त्योहार सिर पर है। ऐसे में कैसे मनाए यह शिल्कार अपनी दिवाली।

By विक्की जोशी

विक्की जोशी मंडल आई.टी. प्रभारी मुरादाबाद