राजकुमार शर्मा
हरिद्वार (परिपाटी न्यूज़) भूपतवाला स्थित भारत भक्ति योग आश्रम (जिसे लोग अमेरिकन आश्रम के नाम से भी जानते हैं) के संस्थापक परम पूजनीय स्वामी देवानंद जी महाराज का 108वाँ जन्मदिवस श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ मनाया गया। इस अवसर पर हवन- पूजन, तथा साधु-संतों के भोजन – सत्संग का आयोजन किया गया। साथ ही रानी गली स्थित “गुरुदेव रसोई” में संत-महात्माओं एवं श्रद्धालुओं के लिए विशाल भंडारे का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम में उपस्थित संत-महात्माओं ने भारत भक्ति योग आश्रम परिवार के सदस्यों को अपना आशीर्वाद प्रदान करते हुए सेवा, समर्पण और आध्यात्मिक मूल्यों के संरक्षण के लिए उनकी सराहना की।
इस दौरान कुछ संतों ने आश्रम की वर्तमान व्यवस्थाओं को देखकर आश्चर्य व्यक्त किया। उनका कहना था कि हरिद्वार में उन्होंने पहली बार ऐसा स्थान देखा है जहाँ आश्रम के संस्थापक एवं गुरुदेव की स्मृतियों को पुनर्जीवित करने तथा उनकी विरासत को संरक्षित करने के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। संतों ने कहा कि किसी भी आध्यात्मिक संस्था के संस्थापक की शिक्षाओं और योगदान को नई पीढ़ी तक पहुँचाना अत्यंत आवश्यक है।
कुछ संतों ने यह भी कहा कि हाल के दिनों में आश्रम से संबंधित विभिन्न चर्चाएँ और विवाद सोशल मीडिया पर देखने को मिले हैं। उनके अनुसार समाज को किसी भी विषय में निष्कर्ष निकालने से पहले तथ्यों की निष्पक्ष जानकारी प्राप्त करनी चाहिए तथा धार्मिक और सामाजिक कार्यों में सहयोग की भावना रखनी चाहिए।
संत-महात्माओं ने अपने प्रवचनों में कहा कि सेवा, सद्भावना और परोपकार के कार्यों में बाधाएँ आती रहती हैं, लेकिन धर्म और समाजहित में कार्य करने वालों को धैर्य, संयम और सत्य के मार्ग पर आगे बढ़ते रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि अंततः सत्य और सदाचार की ही विजय होती है।
कार्यक्रम के आयोजकों ने कहा कि संत समाज के आशीर्वाद और मार्गदर्शन से उन्हें आगे भी सेवा कार्यों को जारी रखने की प्रेरणा मिलती रहेगी। उन्होंने सभी श्रद्धालुओं, संत-महात्माओं एवं सहयोगियों का कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए आभार व्यक्त किया।
अंत में हवन, प्रसाद वितरण और सामूहिक भोजन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। उपस्थित श्रद्धालुओं ने स्वामी देवानंद जी के जीवन, उनके आध्यात्मिक योगदान तथा मानव सेवा के संदेश को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।

जय श्रीकृष्ण। गीता के संदेश का अनुसरण करने वाले साधक सुख-दुःख, लाभ-हानि, जन्म-मरण जैसी परिस्थितियों में समभाव रखते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं। यही जीवन में आध्यात्मिक उन्नति और लोककल्याण का मार्ग है।कार्यक्रम के दौरान उपस्थित कई संत-महात्माओं ने अपने प्रवचनों में कहा कि जब भी धर्म, सेवा, यज्ञ, भंडारा अथवा लोककल्याण के कार्य होते हैं, तब उनके मार्ग में बाधाएँ उत्पन्न करने वाले तत्व भी सामने आते हैं। कुछ संतों ने ऐसे लोगों की तुलना रामायण में वर्णित कालनेमि के चरित्र से करते हुए कहा कि इतिहास और धर्मग्रंथों में भी ऐसे प्रसंग मिलते हैं जहाँ असत्य और भ्रम फैलाने वाले लोग धर्ममार्ग में अवरोध उत्पन्न करने का प्रयास करते रहे हैं।
संतों ने कहा कि जो व्यक्ति निस्वार्थ सेवा, भूखे लोगों को भोजन कराने, संतों की सेवा करने अथवा किसी महापुरुष की विरासत को संरक्षित करने के कार्यों में बाधा डालते हैं, उन्हें अपने कर्मों का फल अवश्य प्राप्त होता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि वे विवादों से ऊपर उठकर सत्य, सेवा और सद्भाव के मार्ग पर चलें।
कुछ संतों ने अपने प्रवचन में श्रीमद्भगवद्गीता के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि मनुष्य को अपने कर्तव्य और धर्म के मार्ग पर अडिग रहना चाहिए तथा फल की चिंता किए बिना निष्काम भाव से कार्य करते रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि परमात्मा न्यायकारी है और प्रत्येक व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार फल प्राप्त होता है। गीता के अनुसार धर्म के पक्ष में खड़े होकर सत्य और सेवा का मार्ग अपनाने वाला व्यक्ति अंततः आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करता है।
संतों ने यह भी कहा कि सच्चे साधु का स्वभाव क्षमा, सहनशीलता और करुणा होता है। भागवत परंपरा में भी संतों को विपरीत परिस्थितियों में धैर्य रखने और समाज के कल्याण के लिए कार्य करते रहने का संदेश दिया गया है।
कार्यक्रम के अंत में संत-महात्माओं ने भारत भक्ति योग आश्रम परिवार को आशीर्वाद देते हुए स्वामी देवानंद जी के आदर्शों को जन-जन तक पहुँचाने तथा उनकी आध्यात्मिक धरोहर को सुरक्षित रखने का आह्वान किया। उपस्थित श्रद्धालुओं ने भजन-कीर्तन, सत्संग और भंडारे में सहभागिता कर कार्यक्रम को सफल बनाया।
