
ये गोपाल पाठा खटीक वो महानायक हैं जिनका नाम इतिहास में लिखा नहीं गया…..

देवेंद्र जोहरी / परिपाटी न्यूज़ मीडिया
गोपाल पाठा खटीक ने अपने साथी एकत्र किये, हथियार और बम इकट्ठे किये और दंगाइयों को सबक सिखाने निकल पड़े।
क्योंकि यह वह व्यक्तित्व हैं जिन्होंने बंगाल के नोआ खाली में हिन्दू मुस्लिम दंगे में मुस्लिमो द्वारा मारे जाने से क्रुद्ध होकर अपने कुछ साथियों के साथ मिल कर मुस्लिम जेहादियों को इस कदर खत्म किया कि हिन्दुओं के मारने पर चुप बैठे “तथाकथित महामानव गांधी जी मुस्लिमो के मारे जाने पर इतने दुखी हुए की अनशन पर बैठ गए।

इस वीर पुरुष का नाम है “गोपाल पाठा खटीक” और इनका कार्य मांस बेचना और काटना था।
16 अगस्त 1946 को कलकत्ता में ‘डायरेक्ट एक्शन ‘ के रूप में जाना जाता है। इस दिन अविभाजित बंगाल के मुख्यमंत्री सुहरावर्दी के इशारे पर मुसलमानों ने कोलकाता की गलियों में भयानक नरसंहार आरम्भ कर दिया था। कोलकाता की गलियां शमशान सी दिखने लगी थी। चारों और केवल हिंदुओं लाशें और उन पर मंडराते गिद्ध ही दीखते थे।
जब राज्य का मुख्यमंत्री ही इस दंगें के पीछे हो तो फिर राज्य की पुलिस से सहायता की उम्मीद करना भी बेईमानी थी। यह सब कुछ जिन्ना के ईशारे पर हुआ था। वह गाँधी और नेहरू पर विभाजन का दवाब बनाना चाहता था।
हिन्दुओं पर हो रगोपाल ल त्याचार को देखकर ‘गोपाल पाठा’ (1913 – 2005) नामक एक बंगाली युवक का खून खौल उठा। उनका परिवार कसाई का काम करता था। उन्होने ने अपने साथी एकत्र किये, हथियार और बम इकट्ठे किये और दंगाइयों को सबक सिखाने निकल पड़े।
वह “शठे शाठयम समाचरेत” अर्थात जैसे को तैसा की नीति के पक्षधर थे। उन्होंने भारतीय जातीय वाहिनी के नाम से संगठन बनाया। उन्होंने हिंदुओं को ललकारते और झकझोरते हुए -एक के बदले दस का सिंहनाद किया, उन्होंने हिंदू समुदाय से कहा – वो हमारे एक भाई को मारेगें, तो हम बदले में दस को मारेगें, जब मरना ही है, तो लडकर मरेगें, मारकर मरेगें, नपुंसक बनकर मत बैठो, आओ बाहर निकलो, तुम वीरों की संतान हो, गोपाल जी के आहवान ने हिंदुओं को जाग्रत कर दिया, और फिर जो पलटवार हुआ, दंगाई जान बचाकर भागते दिखाई दिये ।गोपाल पाठा जी के कारण मुस्लिम दंगाइयों में दहशत फैल गई और जब हिन्दुओ का पलड़ा भारी होने लगा तो सुहरावर्दी ने सेना बुला ली… तब जाकर दंगे रुके। लेकिन गोपाल ने कोलकाता को बर्बाद होने से बचा लिया।
गोपाल के इस “कारनामे” के बाद गाँधी ने कोलकाता आकर अनशन प्रारम्भ कर दिया (क्योंकि उनके प्यारे मुसलमान ठुकने लगे थे)। उन्होंने खुद गोपाल को दो बार बुलाया, लेकिन गोपाल ने स्पष्ट मना कर दिया । तीसरी बार जब एक कांग्रेस के एक स्थानीय नेता ने गोपाल से प्रार्थना कि “कम से कम खुछ हथियार तो गाँधी जी के सामने डाल दो”…….तब गोपाल जी ने कहा कि “जब हिन्दुओं की हत्या हो रही थी, तब तुम्हारे गाँधी जी कहाँ थे ? मैंने इन हथियारों से अपने इलाके के हिन्दू महिलाओं की रक्षा की हैं, मैं हथियार नहीं डालूंगा.. भारत के इतिहास में गोपाल पाठा जी के नाम का कहीं उल्लेख नहीं मिलता.. कारण सभी को पता है..
बंगाल को आज फिर किसी गोपाल पाठा जैसे जननायक की जरूरत आन पडी है.. आज बंगाल में जो हो रहा है, ये 1946 की ही पुनरावृति है.. तब सुहरावर्दी था अब ममता बनर्जी है.. केन्द्र के भरोसे, राष्ट्रपति शासन के भरोसे हिंसा नही रुकेगी.. कश्मीर में लंबे समय राष्ट्रपति शासन रहा, अनेक बार रहा.. लेकिन हिंसा नही रूकी..
जो हिंसा बंगाल की नियति बन चुकी है.. उसके प्रतिकार की आवाज भी बंगाल से ही उठेगी, तब जाकर ही इस पर लगाम लगेगी..हिंदू समाज को अपनी लडाई वैसे ही लडनी होगी…..
सच है, हम लोग जब तक बर्मा के विराथू से संस्कार नही लैगे यही हाल रहेगा।