Spread the love

संवाददाता दीपक तोमर
रेहड़ बिजनौर (पीपीएन)
आज शीत ऋतु का आगाज़ होते ही हर वर्ष विदेशी पक्षियों से गुलजार होने वाला पीलीडाॅम व वैटलैंड इस बार साइबेरियन पक्षियों के न आने से सूना पड़ा हैं।
अमानगढ़ टाइगर रिजर्व एरिया के वैटलैंड, ग्रासलैंड, वाटरहाॅल, लैंडस्कैप व अमानगढ़ से सटा सैकड़ों हैक्टेयर में फैला पीली बांध जलाशय का नैसर्गिक सौन्दर्य सिर्फ़ प्रकृति प्रेमियों को ही नही बल्कि देशी व विदेशी पक्षियों को भी अपनी और आकर्षित करता है। इसी आकर्षण के कारण अक्तूबर नबंवर से लेकर फरवरी मार्च तक प्रवासी पक्षी हजारों की संख्या मे यहाँ प्रवास करने आते हैं।लेकिन इस वर्ष दो माह बीत जाने के बाद भी विदेशी पक्षियों के न आने से वन विभाग व प्रकृति प्रेमी मायूस हैं।
बेहतर भोजन, प्रजनन और सुरक्षा के लिये साइबेरियन पक्षी चार हजार किमी से भी ज्यादा सफर उड़कर तय करके भारत आते हैं। ये लाखों के समूह मे उड़कर सबसे पहले महाराष्ट्र के बारामती के “बिग बर्ड सेंचुअरी” पहुंचते है। उसके बाद ये पक्षी भारत के कोने कोने में जाते हैं और पूरी ठंड बिताते हैं।
कैसे करते हैं भारत आने की तैयारी
माइग्रेशन करने से करीब दो महीने पहले से ही ये पक्षी इसकी तैयारी करना शुरू कर देते हैं। जैसे ही गर्मियां ख़त्म होती हैं और दिन छोटे होने लगते हैं, इन पक्षियों के दिमाग के फोटोरिसेप्टर इनके शरीर में हॉर्मोन में बदलाव करने लगते हैं। हॉर्मोन में इन बदलावों से उनके शरीर पर पंख बढ़ जाते हैं जो लंबे समय तक उड़ने के लिए जरूरी हैं। इसके साथ ही ये पक्षी अपने शरीर पर फैट इकठ्ठा करने के लिए ख़ूब खाते हैं और वजन बढ़ाते हैं। बॉडी फैट बढ़ जाने से इन्हें लंबे सफर में गर्माहट मिलती है और भोजन की भी कमी नहीं खलती।इस तरह करीब 2 महीनों की तैयारी के बाद ये पक्षी लाखों की संख्या में इकट्ठे उड़ान भरते हैं।लेकिन इनका सफर इतना आसान नहीं होता।रास्ते में बहुत सी मुश्किलें आती हैं।आंधी, तूफान और तेज हवाओं से कई पक्षी अपनी जान से भी हाथ धो बैठते हैं।लेकिन फिर भी हर साल भयानक ठंड से भागते हुए वो भारत की ओर रुख करते हैं।
प्रवासी पक्षियों ने रूख बदला
लद्दाख, चीन, जापान, रूस, साइबेरिया, अफगानिस्तान, ईरान, बलूचिस्तान, मंगोलिया, पश्चिम जर्मनी, हंगरी व भूटान के रास्ते से भारत आने वाले पक्षियों पर ज्यादा खतरा मंडरा रहा हैं। विदेशों से पोर्टचाई स्पाटबिल,टीलकूट, बहूमणि हंस, लालसर, चाहा क्रेन, आइविस व डक पक्षी विशेष रूप से भारत आते हैं। इनमें से अधिकतर पक्षियों का शिकार किया जाता है। नतीजतन ये पक्षी पुन: अपने वतन नही लौट पाते हैं। हर साल अक्तूबर से मार्च तक आने वाले प्रवासी पक्षियों की संख्या में भारी गिरावट आई है।
यह बड़े कारण

प्राकृतिक वजह

● क्रमिक विकास की प्रक्रिया के दौरान कई नयी प्रजातियां उत्पन्न होती हैं, जब बदलती परिस्थितियों पर उनका जीवित रहना मुश्किल होने लगता हैं।
● कोई विशिष्ट प्रजाति अपने अस्तित्व में आने के एक करोड़ साल बाद विलुप्त हो जाती हैं।हालांकि कुछ प्रजातियां जिन्हें जीवाश्म कहा जाता हैं बच जाती हैं और करोड़ों वर्ष बीतने के बाद भी अपरिवर्तित रहती हैं।
● विलुप्तता एक प्राकृतिक प्रकिया है, अनुमान है कि कभी भी अस्तित्व में रही 99.9 फ़ीसदी प्रजाति अवशेष विलुप्त हो चुकी है।
# मानवजानित कारण
● क्षमता से अधिक दोहन।
● तकनीकी विकास से पर्यावरण को नुकसान।
● जलवायु परिवर्तन की वजह बनी कृत्रिम गैसों के उत्सर्जन से वायुमंडल में पसरा प्रदूषण।
● अनियमित पर्यटन।
● अतिक्रमण एवं शिकार।
शासन का बेरूखा व्यवहार
वर्ष 1995 में केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने पक्षियों के संरक्षण के लिये वैज्ञानिकों की एक टीम का गठन किया था। उस समिति ने अपनी रिपोर्ट मे नये अभयारण्य बनाने व नये अनुसंधान खोलने की सिफारिश की थी। लेकिन दुर्भाग्य यह कि उक्त रिपोर्ट को भी नौकरशाही ने ठंडे बस्ते में डाल दिया।

By PARIPATI NEWS

PARIPATI NEWS MEDIA GROUP