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ऐसा था भरत प्रेम जो हमें ऐसी शिक्षा देता है पूरी कथा प्रेम पूर्वक पढे,

राजवीर सिंह तोमर/ परिपाटी न्यूज़ मीडिया

चित्रकूट मे सुबह सीता जी रोते हुये दिखायी दी , जानकी की आँखो मे आंसू देखकर राम जी ने पूँछा ,क्यो रोती हो ? सीता जी ने कहा ,” प्रभु आज मैने स्वप्न देखा कि भरत भैय्या आ रहे है । राम जी ने कहा भगवान करे तुम्हार स्वप्न सत्य हो कितना सुन्दर स्वप्न है /सीता जी ने कहा प्रभु मैने यह भी देखा कि तीनो मातायें भी साथ मे है ,राम जी ने कहा ये तो और अच्छी बात है पर इसमे आँसू क्यो ? सीता जी ने कहा मै बोल नही सकती महाराज ! तीनो माताओं के सिर पर न तो सिन्दूर है और न ही बिन्दी / लखन लाल जी की आँखो मे आंसू आ गये ,ऐसा कैसे हो सकता है ?सीता जी ने कहा –
लखन सपन यह नीक न होई
कठिन कुचाह सुनाइहि कोई
राम जी को लगा कि मै दुखी रहूँगा तो सीता और लक्ष्मण दुखी होगे /उन्होने बात बदल दी ,सीता सपने की चिन्ता नही करनी चाहिये ,/इतने मे कुछ संत ,ऋषि गण आये उनका सम्मान करके बैठाये /


इतने मे देखते क्या है उत्तर दिशा की ओर धूल उड रही है ,पशु पक्षी उडकर चित्रकूट मे छिप रहे है /राम जी को शंका हुई आखिर कोई शिकारी आया है या जंगल मे आग लगी है ? तभी भील किरात दौडते दौडते राम जी के पास आकर कहने लगे महराज !अयोध्या से राजकुमार भरत और शत्रुघन जी आ रहे है ,जैसे ही इतना सुना ,जैसे तुलसी बाबा वहाँ पर मौजूद हो बोल पडे —
सुनत सुमंगल बैन मन प्रमोद तन पुलक भर
शरीर पुलकित हो गया ,मन आनन्दित हो गया ,राम जी की आँखो मे प्रेम के आंसू आ गये ,मेरा भाई आ रहा है ,लेकिन तुरन्त प्रभु श्री राम विचार मग्न हो गये बाबा जी लिखते है —
बहुरि सोच बस भे सियरवनू
कारन कवन भरत आगवनू
एक आइ अस कहा बहोरी
सेन संग चतुरंग न थोरी
दूसरे क्षण राम जी विचार करने लगे भरत क्यो आ रहा होगा ? जैसे सुना कि चतुरंगिणी सेना भी है विचार करने लगे /सेना साथ मे है तो भरत मुझसे युद्ध करने ही आ रहा है ऐसा राघवेन्द्र सरकार ने नही सोचा /राम जी तो यह सोच रहे है कि अगर भरत मुझे गद्दी पर बैठायेगा तो मै पिता की आज्ञा की पूर्ति कैसे करुँगा ?एक तरफ भाई का प्रेम होगा ,दूसरी तरफ पिता जी की आज्ञा /राम जी यह सोच रहे है / लेकिन राम जी के भाव को लखन जी नही समझ सके ,उन्होने दबा हुआ क्रोध प्रकट किया -महाराज आज बिना आज्ञा लिये बोल रहा हुँ मेरे अविवेक को क्षमा करना ,भरत और शत्रुघन चतुरंगिणी सेना लेकर आ रहे है तो महाराज उनका हिसाब बहुत स्पष्ट है वे निष्कंटक राज्य करने निकले है ,/उन दोनो ने माना होगा कि राम अकेले है हम उन्हे मार डालेगे परन्तु भैय्या आज मुझे रोकना मत आज मै युद्ध मे भरत को उनकी पूरी सेना के साथ मार डालूँगा ,चाहे उनकी सहायता करने के लिये भगवान शिव भी आ जाय पर वह मेरे हाथ से बचने वाला नही है /
राम जी ने कहा लक्ष्मण ये तुम क्या कह रहे हो भरत ऐसा सोच भी नही सकता ,लक्ष्मण ने कहा भैय्या क्यूँ नही सोच सकता ?
बिषई जीव पाइ प्रभुताई
मूढ मोह बस होंहि जनाई
महाराज विषयी जीव को बडी वस्तु मिलने पर अहंकार आ जाता है ,आप जानते है इसी प्रभुता मे चन्द्रमा गुरु पत्नी गामी हो गया ,नहुष सप्तऋषिओ से अपनी पालकी उठवाने लगा और राजा वेन के समान निकृष्ट कौन होगा /भैय्या इस राजमद से इन्द्र ,सहस्त्रबाहु ,त्रिशंकु आदि नही बच सके तो भरत आखिर है तो कैकेयी का बेटा ही /
लक्ष्मण के क्रोध को देखकर आकाशवाणी हुई —
जगु भय मगन गगन भइ बानी
लखन बाहुबल बिपुल बखानी
आकाशवाणी ने लखन के बाहुबल को सराहा ,धन्य है आपकी शक्ति और बाहुबल , महाराज आपने जो कहा वह बिल्कुल ठीक है ,और आप ऐसा कर भी सकते हो परन्तु एक बात ध्यान देना — बिना विचारे जो करे सो पाछे पछिताय ,भरत जी युद्ध करने नही शरणागति स्वीकार करने आ रहे है /
इस तरह देवताओ ने लक्ष्मण को चुप करा दिया ,तब राम जी धीरे से बोले ,”लखन जो तुमने कहा वह भरत पर लागू नही होता ” लखन लाल जी की आँखो मे आंसू आ गये इसलिये नही कि देवताओ ने उलाहना दिया वरन इसलिये कि जो मैने बोला वह मेरे प्रभु को अच्छा नही लगा ,और वे मुझे उलाहना भी नही देगे /आज मैने अपने आराध्य को नाराज कर दिया ,मैने अपनी माता सुमित्रा की भी अवहेलना आज कर दी —
राग रोग ईर्षा मद मोहू
जनि लपनेहु इन्हके बस होहू
लक्ष्मण जी की आँखो से अश्रुधारा बहने लगी /लक्ष्मण जी का हाथ पकडकर राम जी बोले — भाई चिन्ता मत करो —-
राम जी सोचते है “अब भरत को मार डालू ” ऐसा लखन लाल बोले ,पर वह राम जी को पसंद नही आया ,लखन को उलाहना कैसे दे ?राम जी का स्वभाव अति कोमल है ।उलाहना दिया परन्तु बहुत सुन्दर ढंग से , कहा वैसे तो तुम बहुत बोलते हो पर आज बहुत अच्छा बोले इसमे मे भी जो तूने कहा कि विषयी प्राणी को जरा सी वस्तु मिलने पर अहंकार आ जाता है यह बात मुझे बहुत अच्छी लगी /उसमे मेरी सम्मति है ,वाह प्रभू आज उन्होने लक्ष्मण जी का सारा भार अपने उपर ले लिया /राम जी ने फिर कहा भैय्या लखन अहंकार आता है परन्तु किस पर आता है जिसे स्वप्न मे संतो का साथ न मिला हो ,किन्तु यह बात भरत पर लागू नही होती ,
भरतहि होहि न राजमदु बिधि हरि हर पद पाइ
अगर कोई भरत को ब्रम्हा ,विष्णु ,महेश का सिंहासन भी दे दे तो भरत को अभिमान नही आयेगा ऐसा प्रमाण मै देता हुँ /
सज्जनो जिसके लिये राम विश्वास दे उस पुरुष का तो मात्र नाम लेने से सभी पवित्र हो जाते है /भगवान राम ने कहा लक्ष्मण मुझे तुम्हारी सौगन्ध है ,पिता की सौगन्ध है कि भरत जैसा भाई कोई नही है /
लखन तुम्हार सपथ पितु आना
सुचि सुबंधु नहि भरत समाना
इधर भरत को राम दर्शन की व्याकुलता बढती जा रही है ,निषादराज ने एक टीले पर चढकर चित्रकूट की ओर देखते है ,वहाँ से सुन्दर मनोहर मन्दाकिनी का प्रवाह ,सुशोभित राम का आश्रम ,दर्शन करते ही भाव विभोर होकर भरत जी पुकारते है जल्दी उपर आओ —दोनो भाई दौडते दोडते टीले पर चढते है और जैसे चित्रकूट एवं उसके सानिध्य मे शोभित राम जी के आश्रम का दर्शन किया भरत जी को जो आनन्द हुआ वह अवर्णनीय है —
कबिहि अगम जिमि ब्रम्ह सुख अह मम मलिन जनेसु
राम आश्रम के दर्शन के पश्चात भरत जी ने निषादराज से कहा कि अब आगे हम पैदल नही चलेगे वरन दँण्डवत करते हुये चलेगें /निषाद राज ने कहा महाराज यह पथरीला काँटेवाला मार्ग है ,इस पर दण्डवत करोगे तो तकलीफ होगी ,भरत जी ने कहा कुछ भी हो आगे हम दण्डवत ही चलेगे तभी यह पापी शरीर पवित्र होगा —-…….…

By PARIPATI NEWS

PARIPATI NEWS MEDIA GROUP

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