Spread the love

हमारे भीतर गुणों और शक्तियों का भंडार है। ऐसा मानकर और समझकर अपने को संपन्न करते चलें। दो बातें महत्वपूर्ण है। ऐसी संपन्न आत्मा सदैव स्वयं के प्रति शुभ चिंतन में रहेंगी और अन्य आत्माओं के प्रति शुभचिंतक बनी रहेगी अर्थात शुभ चिंतन और शुभ चिंतक बनना उनकी मूल निशानियां होंगी। इसके प्रभाव से इनके भीतर अशुभ चिंतन और व्यर्थ चिंतन स्वतः ही समाप्त हो जाता है।

शुभ चिंतन अर्थात समर्थ संकल्प के साथ रहना। जिस प्रकार दिन-रात दोनों एक साथ नहीं रह सकते हैं, उसी प्रकार समर्थ और व्यर्थ दोनों एक साथ नहीं रह सकते हैं। प्रातः काल अमृत बेले में उठते ही और आंख खोलते ही शुभ चिंतन और शुभ संकल्प करना है। प्रातः काल अमृत बेला शुभ चिंतन और शुभ संकल्प करने का प्रभाव संपूर्ण दिवस पर पड़ेगा। प्रातः काल अमृत बेला विशेष वरदानों और विशेष सहयोग को प्राप्त करने का समय है। इसलिए अमृत बेला में किए गए पहले संकल्प का आधार सारे दिनचर्या पर प्रभाव दिखाई देता है। अर्थात प्रातः काल अमृत बेला में जैसा संकल्प रचेंगे वैसा ही सारे दिन की दिनचर्या स्पष्ट रूप से आॅटोमैटिक्ली चलेंगी। 


पहला संकल्प कौन सा हो और उस समय हमारी स्टेज कैसी हो या बात हमारे शुभ चिंतन और शुभ संकल्प पर आधारित होती है। आंख खोलते ही चैक करें कि पहला संकल्प हमारा शुभ चिंतन और शुभ संकल्प का हो। इस प्रकार हमारा पहला ही संकल्प समर्थ हो जाता है और हम व्यर्थ से बच जाते हैं। 


शुभ संकल्प और समर्थ संकल्प परमात्मा के संकल्प हैं। इसके चलते हमारा मिलन के दौरान समान भव का वरदान मिल जाता है। जो इतना महान हो उसका सारा दिनचर्या कैसा होगा उसका स्वतः ही अंदाज लगाया जा सकता है। तीन प्रकार की स्टेज बनती है। नंबर वन स्टेज में समान स्वरूप होने के कारण हम समीप रहने का अनुभव करते हैं। इतना अनुभव करते हैं, कि वहां पर दो नहीं केवल एक है। दूसरे नंबर की स्टेज में हम परमात्मा के स्नेह और वरदानों के समान स्वरूप में नहीं होते हैं। लेकिन समान स्वरूप बनने की प्रक्रिया में शुभ संकल्प स्वरूप जैसा होते हैं। ऐसा अनुभूति करते हैं। इस प्रकार फस्र्ट नंबर समान स्वरूप की होती है, लेकिन सैकेंड नंबर समान स्वरूप बनने की प्रक्रिया वालों की होती है। 

लेकिन तीसरे नंबर के लोगों की बात ही निराली और विचित्र है। अभी-अभी देने वाले बनेंगे लेकिन अभी-अभी मांगने वाले भी बन जाएंगे। ऐसे लोग बहुरूपी होते हैं। इसलिए ऐसे लोग कब और किस रूप में मिलेंगे ऐसा कहना मुश्किल है।

जिनका संकल्प सदा श्रेष्ठ होता है, उनके अमृत बेला का पहला संकल्प भी स्वतः श्रेष्ठ होगा। जिसका प्रभाव सारे दिनचर्या पर होता है। ऐसी आत्माएं निरंतर शुभ चिंतन अवस्था में स्वतः रहती हैं। लेकिन सैकेंड नंबर वाले स्वतः ही नहीं रहते हैं बल्कि इन्हें बार-बार शुभचिंतन में बने रहने का अटेंशन देना होगा। लेकिन तीसरे नंबर वालों में शुभ चिंतन और व्यर्थ चिंतन दोनों का युद्ध चलता रहता है। कभी यह विजयी बनते है कभी दिलशिकस्त हो जाते हैं।

पहले नंबर वाले सभी के प्रति शुभचिंतक बने रहते हैं। चाहे कोई तमोगुणी हो अथवा सतोगुणी लेकिन सभी के प्रति शुभचिंतक बने रहते हैं अर्थात अपकारी के ऊपर भी उपकार करने वाले होते हैं। कभी भी किसी के प्रति घृणा की दृष्टि नहीं रखते हैं, क्योंकि यह जानते हैं सामने वाला व्यक्ति अज्ञान के वशीभूत है। शुभ चिंतक सदैव अपने को विश्वकल्याणकारी समझते हुए अन्य आत्माओं के ऊपर रहम दिल होने के कारण घृणाभाव नहीं रखते हैं। ऐसे संपन्न बनने का लक्ष्य रखने के कारण लक्षण धारण करने के कारण इनके भीतर व्यर्थ संकल्प नहीं चलता है, जिसके प्रभाव से इनका हर संकल्प स्वतः ही समर्थ हो जाता है।

त्याग का भाग्य स्वतः ही मिल जाता है। जैसे एक होता है मेहनत से कमाना, दूसरा होता है लाठी से प्राप्त करना। ऐसे ही अपने पुरूषार्थ की शक्तियों को अनुभूति करके विशेष सहयोग का प्रत्यक्ष फल प्राप्त करते है। चैक करें कि मैं चल रहा हूँ, मैं बोल रहा हूँ और जो भी कर रहा हूँ वह करते हुए भी कराने वाला बनके करा रहा है और चलाने वाला चला रहा है। मैं केवल निमित हूँ।

शुभ चिंतन व शुभ संकल्प के प्रभाव से हम स्वमान सैल्फ रिस्पेक्ट के आधार पर अपनी सीट पर सैट रहते हैं। माया सीट को हिलाने की कोशिश तो करती है, लेकिन अपनी सीट पर सैट रहने के कारण हमारी नैचुरल लाईफ बन जाती है, जिसमें टैम्परेरी बातें भूल जाती हैं। शुभ चिंतन के खजाने को बार-बार यूज करने से हमें खुशी प्राप्त होती है। मनन से जो खुशी-रूपी मक्खन निकलता है वह हमारी जीवन को शक्तिशाली बना देती है। इसके प्रभाव से हमें कोई हिला नहीं सकता। माया हिल जाएगी लेकिन हम नहीं हिलेंगे। अंगद के समान हम सदा अचल रहते हुए एकरस स्थिति में बने रहते हैं।

सदा शस्त्रधारी बनकर हम माया का सामना करते रहते हैं। जो शस्त्रधारी हाते है वह निर्भय होते हैं। उनके निश्चय का स्वरूप दुश्मन को भगाने वाला होता है। माया कितना भी निर्भय होकर चले लेकिन हम कभी घबराएंगे नहीं, डरेंगे नहीं, हार नहीं खाएंगे बल्कि सदैव विजयी रहेंगे।

अमृत बेले के अनुभव हमारे लिए लाॅटरी के समान होता है। थोड़े दिनों बाद धीरे-घीरे प्रेक्टिस हो जाने के बाद हम शुद्ध संकल्प और श्रेष्ठ संकल्प में सहज बन जाते हैं और शुभ चिंतक बन जाते हैं।

By PARIPATI NEWS

PARIPATI NEWS MEDIA GROUP

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *