बिजनौर (परिपाटी न्यूज़)मंडावर। मंडावर क्षेत्र के खिरनी गांव में आम के एक हरे-भरे बाग की कटाई को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। ग्रामीणों का आरोप है कि रात के अंधेरे में जेसीबी मशीन से पेड़ों की जड़ें तक उखाड़ दी गईं, जिससे पूरे गांव में आक्रोश और आशंका का माहौल है। लोग पूछ रहे हैं—अगर सब कुछ नियमों के तहत था तो यह कार्रवाई दिनदहाड़े और सार्वजनिक रूप से क्यों नहीं की गई? 40 पेड़ों का परमिट या उससे ज्यादा खेल?
स्थानीय वन विभाग के एक अधिकारी (वन दरोगा) ने बताया कि लगभग 40 पेड़ों की कटाई का परमिट जारी किया गया है। लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि जमीन पर जो हुआ, वह सिर्फ “40 पेड़ों” तक सीमित नहीं लगता। रात में जेसीबी से जड़ों को उखाड़ने की कार्रवाई ने पूरे मामले को संदिग्ध बना दिया है। एक ग्रामीण ने कहा, अगर अनुमति थी तो काम खुलेआम होता। रात में जड़ें उखाड़ना क्या दर्शाता है? कहीं कुछ छिपाया तो नहीं जा रहा?”

वन विभाग पर ‘आंख मूंद’ कर कार्य करने का आरोप गांव वालों का आरोप है कि वन विभाग ने बिना मौके की पारदर्शी जांच और सार्वजनिक सूचना के कटाई की अनुमति दे दी। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या विभाग ने वास्तविक पेड़ों की संख्या और पर्यावरणीय प्रभाव का सही आकलन किया था या नहीं। ग्रामीणों का कहना है कि बिजनौर जिले में पिछले कुछ समय से कॉलोनी काटने वालों और कथित लकड़ी माफियाओं का दबदबा बढ़ा है। पहले बाग काटे जाते हैं, फिर जमीन समतल कर प्लॉटिंग शुरू हो जाती है। खिरनी का मामला भी कहीं उसी कड़ी का हिस्सा तो नहीं? प्रशासन की चुप्पी पर सवाल ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि जिला प्रशासन इस पूरे घटनाक्रम पर मौन है। उनका कहना है कि यदि मामला संवेदनशील है और पर्यावरण से जुड़ा है, तो जिलाधिकारी को तत्काल संज्ञान लेना चाहिए था। लोगों का आरोप है कि लगातार बागों की कटाई के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई या सार्वजनिक जांच रिपोर्ट सामने नहीं आती, जिससे माफियाओं के हौसले बुलंद होते जा रहे हैं।
*बिजनौर में बढ़ता ‘हरित संकट’?* जिले में पहले भी कई स्थानों पर आम के बागों के कटने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि यदि यही हाल रहा तो आने वाले समय में हरियाली का अस्तित्व संकट में पड़ सकता है। ग्रामीणों की मांग है कि: कटे पेड़ों की वास्तविक संख्या की सार्वजनिक जांच हो।
जारी परमिट की प्रति सार्वजनिक की जाए। यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है तो जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो। भविष्य में किसी भी कटाई से पहले ग्राम स्तर पर सूचना और निगरानी की व्यवस्था हो।
*“पारदर्शिता ही समाधान”* ग्रामीणों का साफ कहना है कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन पर्यावरण और कानून से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं करेंगे। यदि सब कुछ वैध है तो प्रशासन को सामने आकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, ताकि अफवाहों पर विराम लगे और जनता का विश्वास कायम रहे।